मुझे याद है माधुरी
जेल के बाहर खड़ी हुई
छरहरी लड़की
चेहरे पर जिद के निसान थे ।
मुझे याद है माधुरी
तहसील के दफ्तर में
बोलती हुंकारती लडती
साथिओ के हक़ दाव पर थे ।
मुझे याद है माधुरी
थकी, पसीने से लथपथ
आँखों में अब भी
असंभव से ख्वाब थे ।
माधुरी अब कहती हो
तुम बूढा रही हो
होगा ही, बूढाओगी ही
पर देखो जहां जहाँ
तुम्हारा पसीना गिरा था
वहां वहां नयी कोपले फट रही हैं ।
मै यह भी याद रखूँगा माधुरी ।
